जज बनने की राह आसान, लेकिन ट्रेनिंग होगी सख्त: सुप्रीम कोर्ट ने वकालत का अनुभव 3 साल से घटाकर 1 साल किया

नई दिल्ली। न्यायिक सेवा में प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है। शीर्ष अदालत ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) जैसी प्रवेश स्तर की न्यायिक सेवाओं के लिए आवश्यक न्यूनतम वकालत अनुभव को तीन वर्ष से घटाकर एक वर्ष कर दिया है। साथ ही चयनित उम्मीदवारों के लिए प्रशिक्षण व्यवस्था को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब देशभर में न्यायिक सेवाओं में प्रवेश की प्रक्रिया, युवा कानून स्नातकों के अवसर और अदालतों में रिक्त पदों को लेकर लगातार चर्चा होती रही है।
तीन साल की जगह अब एक साल का अनुभव
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का सीधा असर उन युवा वकीलों पर पड़ेगा, जो न्यायिक सेवा परीक्षा के माध्यम से जज बनने की तैयारी कर रहे हैं। पहले न्यूनतम तीन वर्ष की कानूनी प्रैक्टिस की शर्त एक बड़ी बाधा मानी जाती थी। अब इसे घटाकर एक वर्ष कर दिया गया है।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक पद पर पहुंचने से पहले केवल परीक्षा पास करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। न्यायिक कार्य की प्रकृति को देखते हुए व्यावहारिक अनुभव और प्रशिक्षण को भी महत्वपूर्ण माना गया है। सुप्रीम कोर्ट के 21 अगस्त 2026 के फैसले में न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए न्यूनतम प्रैक्टिस की शर्त पर पुनर्विचार किया गया।
युवा कानून स्नातकों के लिए खुलेंगे नए अवसर
इस बदलाव से कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले युवाओं के लिए न्यायिक सेवा में प्रवेश का रास्ता अपेक्षाकृत जल्दी खुल सकता है। खासकर उन उम्मीदवारों को फायदा हो सकता है, जो लंबे समय तक प्रैक्टिस करने के बजाय शुरुआती दौर से ही न्यायिक सेवा को अपना करियर बनाना चाहते हैं।
कानूनी क्षेत्र के जानकारों के अनुसार, नई व्यवस्था का उद्देश्य अवसरों को व्यापक बनाना और साथ ही जज बनने वाले उम्मीदवारों की पेशेवर तैयारी को बनाए रखना है।
चयन के बाद ट्रेनिंग पर भी जोर
नई व्यवस्था में चयनित उम्मीदवारों को पर्याप्त प्रशिक्षण देने की दिशा में भी बदलाव किया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कम अवधि की वकालत अनुभव के बावजूद न्यायिक पद संभालने से पहले उम्मीदवारों को अदालत की कार्यप्रणाली, न्यायिक प्रक्रिया और व्यावहारिक कानूनी पहलुओं की पर्याप्त समझ हो।
यानी नई व्यवस्था का मूल संदेश यह है कि जज बनने के लिए प्रवेश का रास्ता छोटा किया जा सकता है, लेकिन जिम्मेदारी संभालने से पहले तैयारी मजबूत होनी चाहिए।
हाई कोर्ट और राज्य सरकारों की भूमिका अहम
न्यायिक सेवा भर्ती का संचालन विभिन्न राज्यों और हाई कोर्ट की प्रक्रियाओं के तहत होता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भर्ती नियमों, विज्ञापनों और पात्रता शर्तों में आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं।
अभ्यर्थियों को सलाह है कि वे किसी भी भर्ती या परीक्षा के संबंध में केवल संबंधित हाई कोर्ट अथवा राज्य लोक सेवा आयोग की आधिकारिक अधिसूचना पर भरोसा करें।
न्याय पालिका में भर्ती व्यवस्था पर बड़ा असर
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश की निचली अदालतों में जजों की भर्ती व्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे युवा कानून स्नातकों को अवसर मिल सकते हैं, जबकि प्रशिक्षण पर जोर देकर न्यायिक गुणवत्ता बनाए रखने का प्रयास किया गया है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अलग-अलग राज्यों में न्यायिक सेवा भर्ती नियमों को इस नई व्यवस्था के अनुरूप किस तरह लागू किया जाता है।
AB News 4U के लिए विशेष रिपोर्ट।
